H031: एक पिल्ला
एक कच्ची सड़क उनके घर पनखेत से गुजर रही थी। वह समतल वी की तरह मोड़ लेते आधा किलोमीटर बाद जंगादेवी
पहुंच रही थी। वहां से कुछ हेयरपिन जैसे मोडो
और त्रीव चढाई से होते हुए दो किलोमीटर बाद नौगांव खाल पहुंच रही थी। यहाँ उनका आधारिक
विद्यालय था। उनके पिताजी के पास एक सरकारी जीप थी पर उस समय बच्चो गाडी से विधालय
भेजने का चलन नहीं था। कोई पानी की बोतल या खाना भी नहीं ले जाता था। सिर्फ किताबो का वजन ही उनकी उतनी छोटी उम्र के लिए
बहुत जायदा था। पप्पू और संजू उनके बस्तो को पीठ में टांक कर पैदल इस रास्ते से पड़ने
जाते थे। रास्ते में थकने और कुछ क्लासो के बाद मध्याह्न भोजन में अंगुलिया चाट लेने
जैसा स्वाद आता था।
विद्यालय के पास एक कुतिया ने कुछ पिल्ले दिए थे।
गांव के लोग उन पिल्लो को ले जाकर अपने घर में पालते थे। उस इलाके में गली के कुत्ते
नहीं हुआ करते थे। पिल्ले बहुत प्यारे लग रहे थे।
वापस आते समय उन्होंने एक पिल्ले को पप्पू के बस्ते
में रख लिया। फिर वह उनके पिताजी के दोस्त सहदेव की दुकान में रस्सी मांगने गए। जिन्होंने
एक चावल के बोरे से सुतली निकला कर उन्हें दी. कुछ टॉफ़ी भी दी, पर बच्चो ने पापा डांटेंगे
कहकर मना कर दिया। रास्ते में उन्होंने बस्ते को खोल कर पिल्ले की सलामती देखी। थोड़ी
देर बाद, उसको कोई परेशानी न हो सोचकर पप्पू ने
उसे अपनी गोद में ले लिया। उन्होंने ने उसे झाड़ियों से हिसालु दिए पर उसने नही
खाये। वह जंगादेवी पहुंचे और उन्होंने मंदिर के नल से पानी पिया।
"पप्पू
माँ यह पसंद नहीं करेगी," संजू बोला।
"पिताजी को मना लेंगे," पप्पू ने जबाब दिया।
वह अपने बंगले के गेट पर पहुंचे, वहां एक लकड़ी का
पोल था जिसने बिजली के तार नहीं पड़े थे। माँ के डर के कारण उन्होंने पिल्ले को पोल
से बांध दिया और घर चले गए। और जैसा वह हमेशा करते थे, उन्होंने अपना बस्ता, कपडे,
और जूते बैठक कमरे के सभी दिशाओ मे फेके। माँ ने उन्हें पराठे दिए जो उन्होने चाय में
डूबा के खाये। अपना पेट भरने के बाद कुछ पराठे उन्होंने पिल्ले के लिए छुपा लिए। भोलू
के साथ वह पिल्ले को भी फुटबॉल खेलने सड़क में ले गए। दौड़ने के लिए वह बहुत छोटा था
पर वह उनके साथ बॉल के पीछे चला।
दिन ढलने पर उन्होंने पिल्ले को पोल से बांधा और घर
आ गये। उस रात जब वह केरोसिन लैम्प की रोशनी में खाना खा रहे थे भोलू बोला "और
पिल्ले का खाना?"
"कौन पिल्ला," पिताजी ने पूछा।
"पप्पू और संजू स्कूल से लाये हैं," भोलू ने रायता फैला दिया।
"मुझे नहीं पता, कहाँ है वह?" माँ ने आश्चर्यचकित
हो कर पूछा।
"गेट के बाहर।" भोलू ने जबाब दिया।
पिताजी ने टोर्च लिया और सभी गेट की तरफ भागे।
“इन शैतान बच्चो को अपने कर्मो का कोई पता नहीं है।
वह ठंड से मर जायेगा," माँ रोते हुए बोली। स्टोर वाले कमरे को साफ़ कर उसके लिए
जगह बनायी गयी। बोरे, पुराने कम्बल और चाद्दर
से उसके लिये बिस्तर बनाया गया। उसे रोटी दाल और पानी दिया गया। अगले दिन वह घर में
सभी जगह भाग रहा था। सभी खुश थे, पर माँ को सब सफाई करनी पड़ रही थी।
कुछ दिनों बाद माँ ने उसे दूध वाले को दे दिया। दूध
वाला बहुत खुश था और सभी दुखी।
No comments:
Post a Comment